Tuesday, 31 July 2018

मुसलमानों (यवनों) के आक्रमणों का इतिहास और राजपूतों के पतन का कारण

मुसलमानों (यवनों) के आक्रमणों का इतिहास:-

यहाँ पर थोड़ा सा विदेशी मुसलमान आक्रमणकारियों का विवरण व क्षत्रियों (राजपूतों) पर अत्याचार का लिखना भी उचित है, क्योंकि इन मुसलमानों ने किस प्रकार के क्षत्रिय जाति पर अत्याचार करके उसे बलपूर्वक आचार-विहीन किया और करने की कोशिश करते रहे. उसी विनाशकारी युग में राजपूत जाति का कितना विध्वंश हुआ और किस प्रकार अपने आत्म सम्मान को सुरक्षित रखा. बहुत से क्षत्रीय आत्म मान की खतिर आज क्षत्रीय समाज से अलग थलग पड़ गये, जो कि विचारणीय प्रश्न है. आज जागरूक क्षत्रीय समाज का ध्यान इस ओर जाना अत्यन्त आवश्यक है. अगर सच पूछा जाय तो मुसलमानी युग में कोई भी स्वाभिमानी क्षत्रीय शेष नहीं था. बल्कि वे व्यक्ति शेष थे. जिन्होंने किसी न किसी प्रकार शत्रुओं की अधीनता स्वीकार करके अपने को बचाकर रखा था. जैसे राजा मानसिंह इत्यादि. जो अपने मानव शान पर अडिग रहे, उन्हें महाराणा प्रताप सिंह जैसी दुःख दाई मुसीबतों का सामना करना पड़ा और जंगलों व पहाड़ों में भटकते रहे. परन्तु मानना होगा कि इन वीर महान पुरुषों का नाम क्षत्रियों की सूची में स्वर्ण अक्षरों में लिखा रहेगा.

मुसलमानों के आक्रमण:-

महसूद बिन कासिम जब भारत पर आक्रमण करने आया था. उस समय सिन्ध प्रदेश में दाहिर नाम का राजा राज्य करता था. मोहम्द बिन कासिम एक विशाल सेना के साथ आगे बढ़ता आया. उसने सबसे पहले 711 ई० में देबुल" नगर पर आक्रमण किया. नगर निवासी अत्यन्त भयभीत हो गये और वे कुछ न कर सके. अत: उसका बड़ी सरलता से उसका देबुल नगर पर अधिकार हो गया. देबुल में कासिम ने वड़ी कठोरता का परिचय दिया. उसने नगर निवासियों को मुसलमान बनने का हुक्म दे दिया. कहा जाता है कि 17 वर्ष की आयु के ऊपर के सब पुरुषों को तलवार के घाट उतार दिया गया. स्त्री और पुरुषों को बंदी बना लिया गया, नगर को खूब लूटा गया और उस धन को सैनिकों में बाट दिया। यहाँ के शासन के बाद सिन्ध व मुल्तान को अपने अधिकार में ले लिया।

 राजपूतों के पतन का कारण:-

यवनों के आक्रमण तो पहले भी होते रहते थे. और लूटकर भाग जाते थे. परन्तु  तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई०) पृथ्वीराज चौहान का विध्वंश शाहबुद्दीन (गौरी) द्वारा हो जाने पर दिल्ली व कन्नौज पर यवनों का अधिकार हो गया.

तराइन के द्वितीय युद्ध की हार की मुख्य वजह पृथ्वीराज चौहान द्वारा कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता तथा राजा जयचन्द राठोड की बेटी का हरण रहा. इसके कारण अधिकांश नाराज राजपूत राजाओ ने अपनी सेनाओ को उस युद्ध में शामिल नहीं किया. जिसके कारण भारतवर्ष में यवन शासन होने पर क्षत्रिय जाति के शासन का पतन शुरू हो गया और तभी से हिन्दू धर्म पर अत्याचार होना शुरू हो गया. बहुत से हिन्दू तो शाहबुद्दीन के समय ही अपने धर्म से हाथ धो बैठे. शाहबुद्दीन अत्यन्त कठोर हृदय और दया शून्य था. उसने मारवाड़ आदि देशों से अपार धन लूट कर अपने देश वापस लोट गया था और दिल्ली का राज्य अपने ऐलची कुतुबुद्दीन के अधिकार में दे दिया. उसके बाद कई यवन बादशाह इस दिल्ली पर राज्य करते रहे. जिनका वर्णन इस प्रकार है
        नाम
1- महमूद गजनवी            
2. शाहबुद्दीन (मु० गौरी)    
3. कुतुबुद्दीन ऐबक            
4. शमशुद्दीन ऐल्तमस        
5. रजिया बेगम व सुकुद्दीन
6. बहरामखां                  
7. अलाउद्दीन मसऊद    
8. नसरुद्दीन                  
9. बलवन                      
10. बेकुवार                  
11. खिलजी वंश:- जलालुद्दीन,अलाउद्दीन, मुबारक
12. तुगलक वंश:- ग्यासुद्दीन उर्फ गाजी वेग, पु० तुगलक, तुग तक फीरोजशाह
13. सिकन्दशाह:- तैमूर  इकबाल
14. सैयद वंश-खिजरखां, विजरखां,अलाउद्दीन
15 लोधी वंश:- बहलोक सुल्तान,सिकन्दर लोदी, इब्राहोम लोदी
16 मुगल वंश:- बाबर, हुमायूं, शेरशाह सूरीसलीमशाह उर्फ जलालखां अकबर जहांगीर, औरंगजेब ,बहादुर शाह, जहन्दर शाह, फरुखसियार उर्फ मु० शाह, नादिर शाह, अहमद शाह दुरनी, आलमगीर, शाहआलमव गुलाम कादिर।

भारत व दिल्ली की लूट:-

जब इन यवनों का भारत में राज्य स्थापित हुआ, तब से चार सौ वर्ष की अवधि में भारतसिंयों को चिन्ता व शोक से छुटकारा नहीं मिला। यवनों के अत्याचारों से समस्त प्रजा अनेक प्रकार से दुखी ही रहती थी। कोई यवन बादशाह ऐसा नहीं हुआ कि जिसके शासन काल में प्रजा को थोड़ा व अधिक कष्ट न मिला हो । पर जितना दुःख औरंगजेब के समय हुआ. वह दिल दहलाने वाला है. जब मुगल सम्राट शाहजहाँ कैद में मर गया. तो औरंगजेब को किसी प्रकार का भय नहीं रहा. उसके महजबी सलाहकारों ने जेहाद के लिए कहा जिसे उसने मान लिया. सबसे पहले काशी बनारस के ऊपर उसका प्रकोप हुआ. वहाँ फरमान निकालकर यह हुक्म हुआ कि कोई पण्डित किसी को वेद व धर्मशास्त्र में पढ़ा. जिस पाठशाला में वेद, धर्मशास्त्र, ब्राह्मण, क्षत्रीय,वेश्य व शुद्र के बालक पढ़ते थे. वे सब बन्द करवा दी गयीं. जबरन छीनकर सारे पाठशालाओं में जो शास्त्र सम्बन्धी पुस्तकें थीं. वह सब यवनों ने जला दीं. इसके साथ-साथ बनारस के प्राचीन मन्दिर विश्वनाथ जी को तोड़कर उसके ईट व गारे से मस्जिद बनवायी गयी. जिसकी निशानी आज तक मौजूद है इसी तरह मथुरा, अयोध्या व सोमनाथ जी आदि अनेक प्राचीन भवशाली मन्दिरों को नष्ट भ्रष्ट कर दिया गया. और अनेक जगहों पर मस्जिदों का निर्माण करवा दिया गया. इतना अत्याचार करने पर भी औरंगजेब की दुष्ट तृष्णा शान्त न हुई फिर उसने मजहब (इस्लाम धर्म को बढ़ाने के लिए मजबूर किया. इस प्रकार उसने राजपूताना, मेवाड़, मारवाड़ आदि समस्त राजाओं को अपनी आज्ञा मानने के लिए भारी दबाव डाला. इस प्रकार इन अत्याचारों से सारे देश में हाहाकार मच गया.

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