Wednesday, 25 July 2018

जानिये राजपूत युग और महत्व और इतिहासकारो के विचार (Rajput Yug or mahatv )

राजपूत युग(Rajput Yug) :-

The p olitical unlication of nor thern India under the sugerainty of Harsha did ot held when the coheie sorce of his peronalty was with draw by his death It soon spilt up into a number of small states. The unified history of a large empire lost itself in localamats.
R K. MUKHRJI
राजपूत युग का तात्पर्य ये हे की राजा हर्ष की मृत्यु के उपरान्त भारत की राजनैतिक एकता एक बार फिर समाप्त हो गई, और वो विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हो गई । इन राज्यों के शासक राजपूत थे।अत: इस युग को "राजपूत युग" के नाम से पुकारा गया है । इस युग का आरम्भ हर्ष की मृत्यु से होता है । जब भारत में मुसलमानों की राज्य सता स्थापित हो गई । हर्ष की मृत्यु 648 ई० में हुई थी और 1200 ई० तक मुसलमानों की राज्य सत्ता भारत में स्थापित हो गई थी, अतएव 647 ई० से 1200 ई० तक के काल को भारतीय इतिहास में राजपूत युग' के नाम से पुकारा गया है ।
डॉ० आर० के० मुखर्जी

राजपूत युग का महत्व(Rajput Yug Ka Mahatv):-

भारत के इतिहास में राजपूत युग का अच्छा खासा महत्व है । यह वह युग था जब भारत पर मुस्लिम लुटेरों ने आक्रमण किया । लगभग 500 वर्षों तक राजपूतों ने वीरता तथा साहस के साथ इन आक्रमण कारियों का सामना किया और अपने देश की स्वतन्त्रता की रक्षा में तन, मन, धन से करते रहे । यद्यपि ये विदेशी आक्रमणकारियों से अपने देश की रक्षा न कर सके, परंतु उनकी वीरता, सौहार्द तथा साहस की कहानियाँ भारतीयइतिहास में अमर हो गई हैं । राजपूतों में कुछ ऐसे महान गुण थे, जिनमें न केवल उनके देशवासी उनके शत्रु भी उन्हें आदर की दृष्टि से देखते थे । राजपूत अपने वचन का पक्का होता था, और किसी के साथ विश्वासघात नहीं करता था । वे कभी शत्रु को रणभूमि में पीठ नहीं दिखाते थे, बरव वीरतापूर्वक युद्ध करके अपने प्राण देकर वीरगति प्राप्त कर लेते थे। निशस्त्र शत्रु पर प्रहार करना महापाप समझते थे और शरण में आये हुए की रक्षा करना अपना परम धर्म समझते थे। वे रणप्रिय होते थे और रणक्षेत्र ही उसकी कर्मभूमि होती थी । देश की रक्षा का भार उसे ही वहन करना पड़ता था । अपने अलौकिक गुणों तथा उच्च आदशों के कारण राजपूत सत्र बड़े आदर्श की दृष्टि से देखे जाते थे ।

कुछ लोग हिन्दुस्थान को गुलाम कहते हे । पर हिन्दुस्थान के इतिहास का ढंग से विश्लेषण करे तो पता चलता हे की हिन्दुस्थान कभी गुलाम हुआ ही नहीं मुस्लिम आक्रमणकारि हिन्दुस्थान में निरन्तर अपनी सत्ता के लिए संघर्ष करता रहा. इसीकारण विश्श्व पर फतह का सपना हिन्दुस्थान में आकर चूर चूर हो गया.

राजपूतों की प्रशंसा करते हुए कर्नल टांड ने लिखा है यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उच्च साहस, देशभक्ति, स्वामिभक्ति, आत्म सम्मान, अतिथि सत्कार तथा सरलता के गुण राजपूतों में अधिकता से विद्यमान थे ।

डॉ० ईश्वरी प्रसाद जी ने राजपूतों के गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- राजपूतों में आत्म सम्मान की भावना उच्च कोटि की होती थी और वह सत्य को बड़े आदर की दृष्टि से देखता था। वह अपने शत्रुओं के प्रति भी बड़ा उदार था और विजयी होने पर वह उसके साथ बर्बरता का व्यवहार नहीं करता था। युद्ध में कभी बेईमानी व विश्वासघात नहीं करता था और गरीब तथा निरपराध व्यक्ति को कभी सताता नहीं था।

ISHigh courage partsiation, localty honowr laspi  tality aud simplicite are qualities with must to once be  coneuded to them to do. Tad IIThe Rajpoot had a high sence of honogr and a stric regard for truth. He was generous towands his toee, and even when he was victorious, him scldom had।
1. recourse to those acts of larbasity which were the in can commitmentis of muslimConqust. He were employad decid or trechery in was and scsupulously adstanod from cousing miscry to the poor and people.
Dr, Isvari Prashad
rajput yug


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