Sunday, 15 July 2018

चौहान वंश का इतिहास ( chauhan rajput history & logo )

चौहान वंश( chauhan vansh) का इतिहास:-

चौहान वंश के चिह्न इस प्रकार हैं
वंश- अग्निवंश। गोत्र- वत्स । प्रवर-5 ( पाँच ) ओवर्य,च्यवन,भार्गव,जामदन्यि, अप्नुवान। वेद- सामवेद ।  शाखा -कोयुमी। सूत्र- गोभिल ग्रह। कुलदेवी-आशापूरा ।  गुरु- वशिष्ठ । ऋषि- शाडिल्म। निशान-पीला । तीर्थ- भृगुक्षेत्र।  नदी- चन्द्रभागा । इष्ट -अचलेश्वर महादेव । कुलदेवता- श्रीकृष्णजी। शस्त्र- तलवार, ध्वजा पर गरुड़ का चिह्न । गद्दी-प्रथम अजमेर, द्वितीय- दिल्ली है ।

चौहान वंश की उत्पत्ती:-

पवित्र अग्निकुल से उत्पन्न हुई शाखाओं में चौहान शाखा ही विशेष बलवान हुई है । इस वीर कुल की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से है । यानी सबसे अन्त में विष्णु भगवान ने दुर्वा दल की बनी हुई पुतली को अग्निकुण्ड में मन उच्चारण कर डाल दिया। उसके अवयव स्वरूप चार हाथ युक्त अस्त्रधारी एक वीर पुरुष प्रगट हुआ । चार हाय होने से उसका नाम ‘‘चतुर्रज” चौहान हुआ । समस्त देवताओं ने उसे आशीर्वाद देकर ‘मेहकावती’’ नगरी का राज्य दिया। जो इस समय ‘गढ़ मण्डला’ नाम से विख्यात है । द्वापर में यह मेहकावती नाम से विख्यात थी। इस प्रसिद्ध राजकुल की शाखाओं ने भी अपने मूलवंश का गौरव बढ़ाकर चौहान नाम को सार्थक किया था। इस कुल की शाखाओं में हाड़ा, खीची, देवड़ा, और अनेक शाखा विशेष प्रसिद्ध हैं । इन शाखाओं की वीरता, प्रतिष्ठा और गौरव का वृत्तान्त (हाल) आजकल भट्ट कवियों के मधुर काव्यों में सुनहरी अक्षरों में लिखा हुआ है । चौहानों की २४ शाख में हैं

चौहान rajput वंश की शाखा:-


1. चौहान:- साचोरा, मैनपुरी में बरगइया शाखा प्रसिद्ध हुई है ।
2. हाड़ा:- बूंदी और कोटा का राजवंश जो हाड़ोती नाम से प्रसिद्ध है ।
3. खीची:- राधोगढ़ - लखनऊ में खीची से निकुम्भ और भदौरिया शाखा हुई हैं । भदौरिया ग्वालियर स्टेट और अन्य प्रदेशों में भी पाये जाते हैं. जिला आगरा में भदौरिया वंश कौ 'भदावर' ' नाम को एक रियासत है। खीची वंश में दुर्ग सिंह नाम का पुरुष हुआ था, जिसमें दरक” नाम की एक शाखा स्थापित हुई थी। मध्यभारत में खीची वंश की खिलचीपुर नाम की रियासत है ।
4. सोनगिर यथा सोनगड़े —मंगलौर के जालौर । इसकी शाखायें हेड़ा और सेनी हैं ।
5. देवड़ा (देवट) सिरोही के,
6. पाविया-पावगढ़ के नाम से
7. संचोरा
8. गायलवाल (गोलवाल),
9. निर्वाण
10. मलानी,
11. पुविया,
12. सूरा,
13. नादडेचा,
14. सक्रेचा,
15. भुरेचा
16. बालेचा-बालेस नाम से, एक नगर बसाया था,
17. तस्सेरा
18. चाचेरा
19.रोसिया
20. चांस, चांदा नामा, चांदनो, लोदरगढ़,
21.भांवर
22. वंकट
23 मोपले
24 धनारिया।
(क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ ११८-११६)

चौहानों Rajputo की वंशावली :-

अनल अथवा अग्निपाल -चौहानों के आादि पुरुष जो विक्रमादित्य से ६५० वर्ष पूर्व अग्निकुण्ड से पैदा हुए थे।उन्होंने तुर्क लोगों को जीतकर मैहकावती में राजधानी स्थापित की थी। फिर कोकण असीर और गोलकुण्डा को विजय किया था । अनल का पुत्र सुबाहु और मालन—इसके वंशज “मालन" चौहान कहे जाते हैं । मालन के गलनसूर, गलनसूर के अजय पाल। इन्होंने अजमेर नगर बसाया था। अजयपाल के दूलाराय सत्र ६८५ में मुसलमानों द्वारा मारे गये और उनका राज्य अजमेर मुसलमानों के अधिकार में चला गया । दूलाराय के मानिकराय-इन्होंने सांभर में चौहानों को
राजधानी स्थापित करके ‘‘सम्भरी राव' की उपाधि धारण की थी। उस समय से चौहान ‘‘सम्भरी राव' कहे जाते हैं। मैनपुरी के चौहानों की शाखा वरगईया से भैसौलिया प्रशाखा सील गांव के नाम नामानुसार हुई है ।

माणिकराय के पुत्र हर्ष राजवीरवीलन, बीसलदेव, सारंगदेव, जो छोटी अवस्था में ही मर गये थे । सारंगदेव के आना—इन्होंने अजमेर में अपने नाम से आना सागर झील बनवायी थी, जो कि अब तक प्रसिद्ध है। आना के पुत्र जयपाल और हर्षपाल थे। जयपाल के पुत्र अजयदेव या ( आनन्द देव ) विजयदेव,उदयदेव । आनन्द देव के पुत्र सोमेश्वर, कान्हाय, जैत (गोलबास) गोयलवाल। सोमेश्वर के पुत्र-पृथ्वीराज और चौहड़देव। कान्हराव के पुत्र ईश्वरी दास। पृथ्वीराज के पुत्र रैन सो। चौहड़देव के पुत्र विजय देवराज। विजयदेवराज के पुत्र लखनसी। उत्तरी चौहानों के राज वंश का आादि पुरुष मानिक राव को समझना चाहिये । उसने दूसरी बार अजमेर जीता था। उसको अधिकतर सन्तान रजवाड़े के पश्चिम में बहुत से वंशों की मानी जाती है। जिसके मनुष्य सिंध नदी तक पाये जाते
हैं । खीची, हाड़ा, मोहल, निर्वानभदौरिया, मोरीचा, धनेरियां, बाग रीचा सब चौहानों की शाखा हैं । इनका राज्य
अभी तक ‘भदावर’ ( रियासत ) में है । जो कि यमुना व ग्वालियर व भिण्ड से लगा हुआ है । जिसके कि वर्तमान राजा श्री महाराजां रिपुदमनसिंह हैं । इनके ही पूर्वजों द्वारा प्रसिद्ध मेला बटेश्वर का आरम्भ कराया गया था।


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