Saturday, 7 July 2018

जानिए राजपूत चन्द्रवंश और अग्निवंश की उत्पत्ती कहा से हुई.

चन्द्रवंश

चन्द्रवंश के राजा सब बुध की सन्तान हैं, इन्होंने ही वैव स्वत मनु की कन्या इक्ष्वाकु की बहिन से विवाह किया था। इन बुध के पुत्र पुरुवा हुए थे, इन पुरुरुवा ने अपनी राजधानी प्रयाग में स्थापित की थी । इनकी तीसरी पीढ़ी में राजा नहुष उत्पन्न हुएइनके पुत्र ययाति राजा ने सूर्यवंशी राजा कुङस्थ गौ की कन्या । इन की नाम से विवाह किया था ययाति की तीसरी पीढ़ी में राजा जान्ह पैदा हुए। इन जाह का विवाह सूर्यवंशी युवानास्वर की कर कारी के साथ हुआ था । यह युवानास्वर सूर्यवंशी मांधाता के पिता थे और धुन्धमार के पुत्र थे । यह वही सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी हैं जिन्होंने भारतवर्ष में जगह जगह नगर बसाये थे, इनमें से बहुत से नगर इस अब समय काल रूपी समुद्र में डूब गये हैं । बहुतेरे खण्डर भी मौजूद हैं जैसे ने नदी चन्द्रवंशी राजा कीतिवीयजुन नर्मदा के
किनारे महिष्मतीपुरी बसाई, वह इस समय महेश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं, इसी कुल में सहस्रार्जुन राजा हुए जिन्होंने यमदग्नि का बध कर डाला था। चन्द्रबंश में ही विख्यात राजा हस्तीजी हुए, इन्होंने ही हस्तनापुर बसाया था। इन्हीं के बंशज कौरव व पाण्डव हुए हैं । प्राचीन अनुभूतियों के अनुसार भी मालूम होता है कि प्राचीन समयमें क्षत्रिय समाज दो भागों में बटा था, एक भाग सूर्यवंशी तथा दूसरा चन्द्रवंशी था । आगे चलकर इसकी तीसरी शाखा हो गई जिस को कि यदुवंश कहने लगे । इसी यदुवंश में श्रीकृष्ण भगवान ने अवतार लिया था, इन्हीं तीन शाखाओं में क्षत्रिय छा जाते थे । कालान्तर में आगे कुल के महान ऐश्वर्यशाली व्यक्तियों के नाम पर भी वंश पड़ने लगेइससे क्षत्रियों की अनेक शाखा व उपशाखायें बन गई, यानी जातियाँ बन गयीं। हर्ष की मृत्यु के बाद इन्हीं विभिन्न क्षत्रियों की शाखाओं ने विभिन्न भागों में अपना अपना राज्य भी स्थापित कर लिया और राजपूत के नाम
से प्रसिद्ध हो गये । हर्ष की मृत्यु के बाद एक बार फिर भारत की राजनैतिक एकता समाप्त हो गई देश के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राजपूत राज्य करने लगे। कहा जाता है कि जब पर रामजी द्वारा बहुत से क्षत्रियों का विनाश कर दिया गया, तब समाज में घोर अव्यवस्था फैल गई थी। लोग कत्तव्य भ्रष्ट हो गये। इससे देवता बहुत दु:खी हुए। उन्होंने आबू पर्वत पर जाकर अग्निवंश की स्थापना की। जिससे चौहान प्रतिहार, पंवार, सोलंकी उर्फ चालुक्य क्षत्रिय पैदा हुए। इसका पूरा वृतान्त हमने आगे अग्निवंश में लिखा है ।

अग्निवंश

जबजब इस पृथ्वी पर राक्षसों (अत्याचारियों) के उत्पात अधिक हए हैं, तबतब महान विभूतियों ने जन्म लेकर इस धरा को पवित्र किया है। जिसके कि प्राचीन उदाहरण काफी मिलते हैं ? जैक से श्री रामचन्द्रजी, श्री नृसिंहजी, श्रीकृष्णजी इत्यादि। जिस समय परशुरामजी ने रुष्ट होकर इस पृथ्वी को अन्यायी क्षत्रियों से मुक्त करने की प्रतिज्ञा की थी उस समय अपने प्रण को पूरा करने में परशुरामजी कुछ अंश में सफल भी हुये थे । केवल कुछ धर्मात्मा क्षत्रिय ही शेष बचे थे । जैसे रघुकुल इत्यादि। श्री रामचन्द्रजी के आगमन पर परशुरामजी के अभिमान का सीता स्वयंवर के समय खण्डन हो गया कि क्षत्रिय शेष हैं। यहीं से परशुराम जंगल को चले गये ।
उसके साथ श्री रामचन्द्रजी यथावत् अपनी मर्यादा के अनुसार राज्य करके इस संसार में राम राज्य की एक अनूठी परम्परा छोड़ गये। सूर्यवंश के लुप्त होने पर फिर इस पृथ्वी पर छत्याचारियों के उत्पात अधिक होने लगे । संसार में कुछ ही ऐसी विभूत्तियाँ रही हैं जिनको कि देश, धर्म, तथा समाज हित की चिन्ता रहती है । उस समय जो हमारे महान ऋषि वशिष्ठ, विश्वामित्रगौतम, अगस्त्यमार्कण्डेयउद्दालक शादि थे, उनके यश, अनुष्ठान व शुभकायों में ये राक्षस प्राय: बाधा डालते थे । राक्षसों के उत्पात से सभी ऋषि, मुनि काफी दु:खी थे। अपने दु:खनिवारण के लिए एक दिन एकान्त में अचलेश्वर () पर्वत पर एकत्र होकर आपस में इन्होंने विचार विमर्श किया कि इन दुष्टों से किस प्रकार छुटकारा पाया जाय । विचारविमर्श के बाद यह निर्णय हुआ कि शंकर
भगवान की आराधना की जाय। शंकर भगवान ही एक ऐसे देव हैं जो कि हमारे दु:ख का निवारण कर सकते हैं । ऐसा निर्णय करके इन ऋषियों ने तप ( प्रार्थना ) करके शंकर भग वान को प्रगट होने के लिए मजबूर कर दिया । शंकर भगवान के प्रकट होने पर ऋषि, मुनि उनकी नाना प्रकार से स्तुति करने लगे । शंकर भगवान ने प्रसन्न होकर इनसे बरदान माँगने को कहा। इन सब ने कहा कि हम राक्षसों के अत्याचारों से बहुत दु:खी हैं, शंकर भगवान ने इनकी अभिलाषा जानकर कहा कि 'तथास्तु ' ! वहाँ विधिपूर्वक यज्ञ के अनुष्ठान का निश्चय कर इन्होंने अपना यश करना शुरू कर दिया। (य कुण्ड ८ अंगुल गहरा साढ़े तीन हाथ चौड़ा, साढ़े तीन हाथ लम्बा थ) उसकी धूपधूत व नैवेद्य की सुगध चारों तरफ फैली, तो राक्षसों को शक हुआ कि हमारे विनाश के लिए कुछ महात्मा उपाय कर रहे हैं। उन्होंने फौरन आकर नाना प्रकार की अपवित्र वस्तु जैसे रुधिरमांस, मलसूत्र
वगैरह डालकर उस यज्ञ को विध्वंस कर दिया। राक्षस लोग यज्ञ विध्वंस करके भाग गये । महात्माओं के मंसूबे अपूर्ण ही रह गये और वे बहुत ही निराश हो गये । मुनियों ने धीरज धारण करके दुबारा यज्ञ करने का निर्णय किया। उसी श्रृंखला में उसी पर्वत पर फिर नवीन यज्ञ वेदी का निर्माण किया गया । निर्माण के बाद इस यज्ञ को पूर्ण करने का सारा भार श्री वशिष्ठ जी पर डाला गया । श्री वशिष्ठ जी ने सहर्ष स्वीकार करके विधिपूर्वक यज्ञ किया । कोई भी काय्र्य विधिपूर्वक व निष्ठा के साथ किया जाता है तो उसमें संफलता मिलने में कोई संदेह नहीं रहता, इसीलिए मुनियों के द्वारा किया गया य पूर्ण सफल हुआ। उस अग्नि कुण्ड में से तीन महापुरुष परिहार, प्रमार और सोलंकी (चालुक्य) क्षत्रिय उत्पन्न हुए। इन तीनों क्षत्रियों को यशकुण्ड की रक्षा करने का भार सौंपा गया, इन तीनों क्षत्रियों को राक्षसों का विनाश करने में पूर्ण सफलता नहीं मिली। तब वशिष्ठ जी ने एक नवीन यशकुण्ड की रचना की और वशिष्ठ जी प्रह्माजी का ध्यान धर कर आहुति देने लगे, जिससे तुरन्त ही
चार बह बाला चारों हाथों में खन आदि शास्त्र लिए रक्त वर्णदीर्घकाय, महान तेजस्वी एक पुरुष प्रगट हुआआता । इस पुरुष के उन्नतबंध विशाल ललाट, वक्षस्थल, काले घराले बाल, रक्तनेत्र, विकट भृकुटी और शरीर गुलाब जैसे फूस के रंग का था। यज्ञकुण्ड से निकले हुए इस पुरुष को देखकर वशिष्ठजी ने उसे "चाहवान" नाम से सम्बोधित किया और उसी समय वेदमन्त्र पढ़कर उसका राज्याभिषेक करके उसे दैत्यों व राक्षसों से युद्ध करने की आज्ञा दी। जब चाहवानजी युद्ध करने को तैयार हुए तब वशिष्ठ जी ने इनकी सहायता के लिए आशापूरा देवी का आह्वान किया। उसी समय आशा पूरा ने सिंह पर सवार होकर सब शस्त्र धारण कर चाहवान
की सहायता की। उस युद्ध में यन्त्रकेतु को चाहवान ने और धूमकेतु को आशापूरा ने मारा । इन दोनों राक्षसों का वध होने पर सभी राक्षस दल भाग गया। तब देवी ने प्रसन्न हो।र चाहुबान से कहा कि हे वत्स ! मेरा नाम आशापूरा है। तू मुझे अपनी कुल देवी मात, मेरे स्मरण मात्र से मनवांछित फल प्राप्त होगा।’ इस प्रकार देवी आशीर्वाद देकर अन्तत हो गई । उधर अग्निकुण्ड में से चार मुख वाला इंकार करता हुआ पुरुष पैदा हुआ, वह चारों मुद्दों से वेद का उच्चारण कर रहा था जिसे देखकर सब ऋषियों ने उसकी स्तुति की । उसने सभी को आशीर्वाद दिया और चारों उत्पन्न हुए क्षत्रियों का नाम कुल गोत्र, भाषा सूत्र बतलाकर अन्तर्धान हो गया।
तब से चार क्षत्रिय अग्निवंशी सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं क्योंकि सूर्यवंश व चन्द्रवंश गर्भ से उत्पन्न हैं ।

नोट:- सूर्यवंश तथा चन्द्रश जैसे सूर्य व चन्द्रमा से उत्पन्न हैं वैसे ही परिलवंश अग्नि से उत्पन्न है । इसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में भिन्नभिन्न प्रकार की बातें कही गई हैं । जिसमें मुख्य भविष्य पुराण तथा चन्द्रवरदाई कृत रासौ ग्रन्थ है । इसका कुछ अंश प्रमाण रूप में यहां उरुलेख किया जाता है चन्द्रवरदाई द्वारा कृत रास ग्रन्थ--

तब सुशिष्य वशिष्ठ, कुण्ड रोचन रचिता मह ।
धरिय ध्यान यज्ञ होम, मध्य बंदी सुर सामह ॥
तब प्रगो प्रतिहार, राजतिन ठौर सुधरिय ।
पुनः प्रगो चालुक्य ब्रह्म चारी व्रत धारिय ॥
पवांर प्रगटयो वीरवर, कहयो रिण्य परमार धन।
त्रय पुरुष बुद्ध कीनों अतुल, महष्पस मुद्दत तन ।
-रासो ग्रन्थ से

श्लोक :-
एतरिमन्नेव काले तु, कान्यकुब्जो द्विजोत्तमः।
आई द शिखर प्राप्य ब्रह्होममथाकरोत् ॥ ४५
वेदमंत्रप्रभावाच्च जाताश्चत्वार: क्षत्रियाः।
प्रमरस्सामवेदीच । चुपुहानि यजुचिदः ॥ ४६
त्रिवेदी व तथा शुक्लोडथ स परिहारक:।
एरावतकुले जातागजानारुझते पृथक् ॥ ४७
अशोक स्वर्ण चक्रस्सचे बौद्धा विनाशिताः।
चतुलंक्षाःस्मृता बौद्धा दिव्य प्रहारिताः ॥ ४८
शास्ते:
अवम्ते प्रमरो भूषश्चतुर्थीजन-बिस्तृताम।
अवन्तीनाम पुरीमथ्यास्य सुखितोॐवत ।। ४है।
चित्रकूटिगिरेद् शे परिहा महीपतिः।
कलिजरपुरे रम्ये स्मृतम् ॥ १।
मनोशायत
अध्यास्य ब्रह्महन्ता स सुखितो-भवजितः ।
राजपुत्राख्यदे से च च४हानिर्महीपतिः ॥ २
अजमेरपुरं रम्यं विधिशोभासमन्वितम् । । ३
चातुवष्ययुत दिव्यमध्यास्य सुखितोsभवत्
शुक्लो नामः महीपालो गत आमतंमण्डले।
द्वारका नाम नगरीमध्यास्य सुखितोsभवत् ॥ ४

भाषा कहते हैं जब भारत में अशोक के समय (२०००/३ महा ४० प्र० प० ५ अ०) वर्ष हुए, जब वैदिक धर्म का
ह्रास होने लगा था और देश में बौद्धों के कारण प्रजा में हाहाकार मचा था। ठीक उसी समय आबू पहाड़ पर एक कान्य कुब्ज ब्राह्मण ने वेद विधि से अरिनकुण्ड तैयार कर वैदिक मन्त्रों से हवनकुण्ड में ब्रह्माहोम नामक यज्ञ किया था, जिसके प्रभाव से उस कुण्ड से चार अहतियों द्वारा क्रम से प्रमार ( परमार ) चहुआनपरिहार कर शुक्लांगी राजा उत्पन्न हुए । जिनमें से प्रमार सामवेदी, चपहानि यजुर्वेदी,परिहार अथर्ववेदी और शुक्लांगी त्रिवेदी हुए। इनके बाद ऐरावत हाथी पर चारों बीरगण सवार हो महाराज अशोक के पास पहुंचे । इनको अपने पक्ष में किया और ४ लाख बौदों का अपने अस्त्रोंसे संहार किया और राजा प्रमार ने ४ (चार) योजन विस्तृत अम्बावती नगर की प्रतिष्ठा की और उसमें आप रहने लगे। परिहार राजा ने चित्रकूट गिरि पर कालिजर
नामक रमणीक स्थान में अपना निवास किया। इसी प्रकार राजा चपहानि ने राजपूताना प्रदेश के अजमेर स्थान में अपनी राजधानी स्थापित की और शुक्लांगी राजा ने अन-मण्डल को द्वारिका नगरी में अपनी राजधानी स्थापित की और वहीं रहने लगे । (लेखक उदयनारायन सिह निकुम्भ)
अगला भाग:- राजपूत चन्द्रवंश और अग्निवंश की उत्पत्ती भाग:-2

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